सूखे पत्तों की सरसराहट
जैसे विचारों के टूटने का अहसास दिलाती हो,
जी करता है मैं भी शिकायत करूँ
बहती सर्द हवा से
ढलते सूरज से
सिमटती परछाई से
घोसलों में जाती चिड़ियों से
उन सारे प्रतीकों से
जो इस शाम के अकेलेपन का अहसास कराती हैं ।
आड़ी-तिरछी पगडंडियों पर,
बेमतलब कदमो से रौंदता दूंढ़ रहा उस पगडण्डी को
जो दिल से दिमाग को जाती है
विस्मित होता बार बार
बेमतलब प्रयास ।
जी करता है मैं भी काट दू जो राह तुम तक जाती है
जैसे विचारों के टूटने का अहसास दिलाती हो,
जी करता है मैं भी शिकायत करूँ
बहती सर्द हवा से
ढलते सूरज से
सिमटती परछाई से
घोसलों में जाती चिड़ियों से
उन सारे प्रतीकों से
जो इस शाम के अकेलेपन का अहसास कराती हैं ।
आड़ी-तिरछी पगडंडियों पर,
बेमतलब कदमो से रौंदता दूंढ़ रहा उस पगडण्डी को
जो दिल से दिमाग को जाती है
विस्मित होता बार बार
बेमतलब प्रयास ।
जी करता है मैं भी काट दू जो राह तुम तक जाती है
तुमसे जुड़े होने का केवल आभास दिलाती है ।
शांत पानी की गहराई अंतर्मन को समझाती है
चट्टानें अपनी अकड़ से चरित्र को सिखाती हैं,
कुछ बूंदे छलकने से गहराई
कम हो जाएगी
या कुछ रेत गिरने से चट्टान गिर जाएगी
जी करता है मैं रोऊँ आज
कुछ मिथ तोडू आज
या बना रहूँ आदर्श, संतोषी, सहनशील ।
------ अजय गौतम 'आहत'




